प्राचीन भारत में श्रवण कुमार नाम का एक युवक रहता था। वह अत्यंत धार्मिक, सच्चरित्र और अपने माता-पिता का बहुत सेवा करने वाला था। उसके माता-पिता दोनों ही अंधे थे और अत्यंत वृद्ध थे, इस कारण वे पूरी तरह से श्रवण पर निर्भर थे। श्रवण कुमार का समर्पण अपने माता-पिता के प्रति इतना गहरा था कि वह उनके हर छोटे-बड़े काम का ध्यान रखता था। वह एक आदर्श पुत्र था, जिसने अपने माता-पिता के सुख-दुख को ही अपना जीवन उद्देश्य बना लिया था।
माता-पिता की अंतिम इच्छा
श्रवण कुमार के वृद्ध माता-पिता की एक आखिरी इच्छा थी कि वे जीवन के अंतिम चरण में पवित्र तीर्थ स्थानों की यात्रा करें। लेकिन अंधे और कमजोर होने के कारण वे खुद यात्रा नहीं कर सकते थे। यह जानकर कि उनके पास इस इच्छा को पूरा करने का कोई साधन नहीं है, वे बहुत दुखी हो गए। उन्होंने श्रवण कुमार से अपनी इच्छा व्यक्त की, और श्रवण ने बिना किसी झिझक के उनकी तीर्थ यात्रा की तैयारी शुरू कर दी।
हालांकि श्रवण के पास धन या कोई सवारी नहीं थी, लेकिन उसने अपनी माता-पिता की सेवा के प्रति अपनी निष्ठा में कोई कमी नहीं आने दी। उसने एक लंबा बाँस लिया, उसके दोनों सिरों पर दो बड़ी टोकरियाँ बाँधीं और उनमें अपने माता-पिता को बिठा लिया। इसके बाद वह खुद उन टोकरी को अपने कंधे पर उठाकर अपनी माता-पिता को तीर्थ यात्रा पर ले चला।
तीर्थ यात्रा का सफर
श्रवण कुमार ने अपने माता-पिता को कंधे पर उठाकर कई पवित्र स्थानों की यात्रा की। वह दिन-रात बिना थके अपने माता-पिता को लेकर चलता रहा। जब भी उसके माता-पिता को भोजन या पानी की जरूरत होती, वह तुरंत उसकी व्यवस्था करता। अपने माता-पिता की सेवा में श्रवण कुमार की निष्ठा और समर्पण अनुकरणीय था। उसने अपने सुख-दुख की कोई परवाह नहीं की, बस अपने माता-पिता की खुशियों को ही अपना परम धर्म माना।
दुर्भाग्यपूर्ण घटना
एक दिन, जब श्रवण कुमार अपने माता-पिता के साथ एक घने जंगल से गुजर रहा था, उसके माता-पिता को प्यास लगी। श्रवण ने उन्हें पेड़ के नीचे आराम से बिठाया और खुद पानी की तलाश में पास की नदी की ओर चला गया।
उसी समय, अयोध्या के राजा दशरथ भी उसी जंगल में शिकार खेलने आए थे। दशरथ बहुत ही कुशल तीरंदाज थे और वे बिना देखे केवल आवाज़ सुनकर निशाना साध सकते थे। जब राजा ने नदी के पास कुछ हलचल की आवाज़ सुनी, तो उन्हें लगा कि कोई जानवर पानी पी रहा है। बिना देखे उन्होंने उस दिशा में तीर चला दिया। तीर जाकर श्रवण कुमार को लगा, जो पानी भर रहा था।
तीर लगते ही श्रवण कुमार गिर पड़ा और उसकी हालत गंभीर हो गई। जब राजा दशरथ पास पहुंचे, तो उन्हें समझ में आया कि उन्होंने गलती से एक निर्दोष युवक को मार डाला है। राजा दशरथ ने श्रवण कुमार से माफी मांगी, लेकिन श्रवण कुमार की हालत बहुत खराब थी।
श्रवण कुमार की अंतिम इच्छा
श्रवण कुमार ने अपने अंतिम समय में राजा दशरथ से कहा, "महाराज, मैंने कोई पाप नहीं किया। मेरे अंधे माता-पिता प्यासे हैं और नदी किनारे बैठे हैं। कृपया उन्हें पानी पिला दीजिए और मेरी मृत्यु की खबर उन्हें दे दीजिए। वे मेरे बिना जीवित नहीं रह पाएंगे।"
यह कहकर श्रवण कुमार ने अपने प्राण त्याग दिए। राजा दशरथ इस घटना से बहुत दुखी हो गए, लेकिन उन्होंने श्रवण कुमार की अंतिम इच्छा पूरी करने का संकल्प लिया। वे खुद उस नदी का जल लेकर श्रवण के माता-पिता के पास पहुँचे।
श्रवण कुमार के माता-पिता का दुःख और श्राप
जब राजा दशरथ ने श्रवण कुमार के अंधे माता-पिता को यह दुःखद समाचार सुनाया, तो वे अत्यंत शोक में डूब गए। उनका एकमात्र सहारा, उनका पुत्र, अब इस दुनिया में नहीं था। राजा दशरथ ने उनसे माफी मांगी और कहा कि उन्होंने अनजाने में यह अपराध किया है।
श्रवण के माता-पिता ने गहरे दुख के साथ कहा, "राजा दशरथ, हमने अपना इकलौता सहारा खो दिया है। अब हमारे जीवन में कुछ नहीं बचा। जैसे हम आज अपने पुत्र के वियोग में तड़प रहे हैं, वैसे ही एक दिन तुम भी पुत्र वियोग में तड़पोगे।"
यह कहते हुए उन्होंने श्राप दिया कि राजा दशरथ भी अपने प्रिय पुत्र से वियोग में तड़प-तड़प कर मरेंगे। इसके बाद श्रवण के माता-पिता ने भी अपने प्राण त्याग दिए।
श्राप की पूर्ति
श्रवण कुमार के माता-पिता द्वारा दिया गया श्राप बाद में राजा दशरथ के जीवन में सच्चाई बनकर आया। जब भगवान राम, दशरथ के सबसे प्रिय पुत्र, को वनवास जाना पड़ा, तब राजा दशरथ अपने पुत्र वियोग को सहन नहीं कर सके। वह उसी प्रकार तड़प-तड़प कर मर गए, जैसे श्रवण कुमार के माता-पिता उनके वियोग में मरे थे।
कहानी से शिक्षा
श्रवण कुमार की यह कहानी आदर्श पुत्र भक्ति की मिसाल है। यह हमें सिखाती है कि माता-पिता की सेवा करना, उनकी देखभाल करना और उनका सम्मान करना हमारा सबसे बड़ा कर्तव्य है। माता-पिता का आशीर्वाद जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति होती है, और उनकी सेवा में ही सच्चा सुख मिलता है। श्रवण कुमार की निष्ठा, त्याग और सेवा भावना हमें यह याद दिलाती है कि दुनिया के हर सुख से बढ़कर माता-पिता का सुख है।
इस कहानी से हमें यह भी शिक्षा मिलती है कि हमारे कर्मों का फल अवश्य मिलता है, चाहे वह अच्छा हो या बुरा। इसीलिए हमें अपने जीवन में सही रास्ते पर चलते हुए अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

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