कौवे को मिला भोजन
एक दिन कौवे ने कहीं से एक बड़ा और स्वादिष्ट रोटी का टुकड़ा पाया। वह उस रोटी के टुकड़े को अपनी चोंच में पकड़कर पेड़ की एक ऊंची शाखा पर जाकर बैठ गया और मज़े से खाने की तैयारी करने लगा। लोमड़ी उस समय पेड़ के नीचे ही टहल रही थी और उसने कौवे की चोंच में वह रोटी का टुकड़ा देख लिया।
लोमड़ी तुरंत समझ गई कि अगर उसे वह रोटी का टुकड़ा चाहिए, तो उसे अपनी चतुराई से कौवे को बेवकूफ बनाना पड़ेगा। वह कौवे के पास गई और चापलूसी भरे शब्दों में बोली, "अरे कौवे भाई! तुम कितने सुंदर हो! तुम्हारे काले पंख तो ऐसे चमक रहे हैं जैसे काले मोती। सच में, तुम जंगल के सबसे सुंदर पक्षी हो!"
कौवा लोमड़ी की बातों से थोड़ा खुश हुआ, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। वह अपने रोटी के टुकड़े का आनंद लेना चाहता था, इसलिए उसने लोमड़ी की बातों को अनसुना कर दिया।
लोमड़ी की चाल
लोमड़ी समझ गई कि सिर्फ तारीफ से काम नहीं चलेगा, उसे और कुछ कहना होगा। उसने चालाकी से कहा, "कौवा भाई, मुझे तो यह भी सुनने में आया है कि तुम सिर्फ सुंदर ही नहीं हो, बल्कि तुम्हारी आवाज भी बहुत मधुर है। क्या तुम मेरे लिए एक गीत गाओगे? तुम्हारी मधुर आवाज सुनकर मेरा दिल खुश हो जाएगा।"
अब कौवा लोमड़ी की चापलूसी से पूरी तरह प्रभावित हो चुका था। उसने सोचा, "लोमड़ी सच कह रही है, मैं तो वाकई बहुत सुंदर हूँ और मेरी आवाज भी अद्भुत है। मुझे एक गीत गाकर अपनी महानता का प्रदर्शन करना चाहिए।"
कौवे की मूर्खता
जैसे ही कौवा ने गाने के लिए अपनी चोंच खोली, उसके मुँह से रोटी का टुकड़ा नीचे गिर गया। लोमड़ी पहले से ही तैयार थी, उसने झट से वह रोटी का टुकड़ा उठाया और खुशी-खुशी खाने लगी।
कौवा हैरान रह गया। उसने अपनी मूर्खता पर पछतावा किया, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। उसने देखा कि लोमड़ी मुस्कुराते हुए दूर जा रही थी, और वह रोटी का टुकड़ा खाने में व्यस्त थी।
लोमड़ी की जीत
लोमड़ी ने जाते-जाते कौवे से कहा, "कौवा भाई, अगर तुम चापलूसी में न फंसते और अपने भोजन पर ध्यान देते, तो तुम्हारा भोजन मेरे हाथ नहीं आता। याद रखना, चापलूसी में कभी नहीं आना चाहिए।" यह कहकर लोमड़ी वहां से चली गई।
कौवा दुखी होकर सोचने लगा, "लोमड़ी सही कह रही है। मुझे चापलूसी में फंसकर अपनी रोटी खोनी नहीं चाहिए थी। अब मुझे इस बात से सबक मिला है कि भविष्य में मैं चतुराई से काम लूंगा और चापलूसी करने वालों से सावधान रहूंगा।"
कहानी से शिक्षा
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि चापलूसी करने वालों की बातों में कभी नहीं आना चाहिए। हमें अपनी समझदारी से काम लेना चाहिए और कभी अपनी बुद्धि और ध्यान को किसी की झूठी तारीफ में बर्बाद नहीं करना चाहिए।


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